जेटली की जंग सुषमा के संग

संघ समर्थित राजनीति में राजनीतिक हमला करने का नियम ठगों और छिनैती करनेवालों से काफी मिलता जुलता है. यह नियम है हमला करने से पहले आहट और आभास बिल्कुल भी मत होने दो. हमला करने के बाद वह खुद चिल्लाएगा जिसने मार खायी है. आउटलुक पत्रिका में सुषमा स्वराज ने जब यह कहा कि बेल्लारी के रेड्डी ब्रदर्स से उनका सिर्फ इतना ही नाता है कि वे साल में एक दिन पूजा करने बेल्लारी जाती हैं तो पूरा रेड्डी कुनबा उनके साथ होता है, अन्यथा बाकी के 364 दिन वे क्या करते हैं, इससे उनका कोई लेना देना नहीं है.

उल्टे सुषमा स्वराज ने यह कहकर सनसनी पैदा कर दी कि यह तो अरुण जेटली जाने जो कि कर्नाटक के प्रभारी हैं. उन्होंने तो रेड्डी बंधुओं से इसलिए बात कि क्योंकि राजनाथ सिंह और अरुण जेटली ने उन्हें कहा था कि कर्नाटक की सरकार बचाने के लिए वे रेड्डी ब्रदर्स से बात करें. सुषमा के इसी बयान से पार्टी के भीतर भूचाल आ गया है.

कर्नाटक की सरकार को बचाने के लिए सुषमा स्वराज और गडकरी के बीच एक सौदा हुआ है. यह सौदा था कि सुषमा स्वराज बेल्लारी के रेड्डी ब्रदर्स को तैयार करके बागी विधायकों का समर्थन कर्नाटक सरकार को दिलवाएंगी. बदले में नितिन गडकरी उमा भारती की वापसी की योजना को विराम दे देंगे. सुषमा स्वराज को राजनीतिक रूप से बड़ा खतरा उमा भारती से ही है.

अगर उमा भारती पार्टी में वापस आ जाती हैं तो सुषमा स्वराज के लिए न केवल केन्द्र में बल्कि मध्य प्रदेश में स्थिति खराब हो जाएगी. समझौता हो गया. समझौते के बाद गोरखपुर में रैली करने पहुंचे नितिन गडकरी ने पत्रकारो से कह भी दिया कि उमा भारती या गोविन्दाचार्य के पार्टी में वापस आने की कोई योजना नहीं है. सुषमा स्वराज ने भी रेड्डी ब्रदर्स से बात करके बागी विधायकों को येदुरप्पा के साथ खड़ा कर दिया. फिर ऐसा क्या हुआ कि सुषमा स्वराज ने अरुण जेटली पर हमला बोल दिया?

उमा भारती को निपटाने के बाद अब सुषमा स्वराज के निशाने पर अरुण जेटली ही बचते हैं जो उनको सर्वोच्च नेता होने से रोक रहे हैं. अरुण जेटली कर्नाटक के प्रभारी हैं और अरुण सुषमा की राजनीतिक जंग में कर्नाटक की सरकार की जान फंसी हुई है. आज से साल दो साल पहले अरुण जेटली और सुषमा स्वराज दोनों एक ही सुर में बोला करते थे जब राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष हुआ करते थे. उस वक्त दोनों के समान दुश्मन राजनाथ सिंह थे.

अरुण जेटली ने तो असम में सुधांसु मित्तल को दलाल घोषित करके राजनाथ सिंह को पटखनी देने की कोशिश की थी. राजनाथ सिंह अड़ गये तो अरुण जेटली और राजनाथ सिंह में आडवाणी ने सुलह करवायी थी. लेकिन अब वही अरुण जेटली राजनाथ सिंह के खास हो गये हैं. कारण उत्तर प्रदेश का चुनाव है. उत्तर प्रदेश में बदतर हालत के बावजूद कलराज मिश्र को मुख्यमंत्री बनाने का झुनझुना राजनाथ सिंह पकड़ा चुके हैं लेकिन अरुण जेटली राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का सर्वमान्य नेता बताकर यह झुनझुना उनके हाथ में दे रहे हैं.

अरुण जेटली जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में पार्टी की दशा दयनीय होने जा रही है इसलिए वहां चुनाव परिणाम अच्छे नहीं आयेंगे तो हार का ठीकरा राजनाथ सिंह पर फूटेगा और दिल्ली में उनकी दावेदारी कमजोर हो जाएगी.

राजनाथ सिंह को कमजोर करके अरुण जेटली सुषमा स्वराज को भी पछाड़ना चाहते हैं इसलिए अपने मीडिया संपर्कों का इस्तेमाल करके सुषमा स्वराज के खिलाफ लंबे समय से प्रचार अभियान को हवा दे रहे हैं. अब जबकि गडकरी सुषमा पैक्ट हो चुका है तब सुषमा के लिए ज्यादा आसान है कि वे अरुण जेटली पर सीधे हमला बोल दें. इन हमलों में आखिरकार विजयी कौन होता है और शीर्ष नेतृत्व पर कब्जा किसका होता है इसका परिणाम आने में अभी बहुत वक्त है लेकिन ये शुरूआती ट्रेलर भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र की असली कहानी कह रहे हैं.

भाजपाई चूहे आपस में लड़ रहे हैं. लेकिन इसी भाजपा में एक बिल्ली भी बैठी है जो दूर गुजरात से सारी लड़ाई की रिपोर्टिंग इकट्ठा करती है और राज्य में बैठकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा निर्धारित करती है. वह बिल्ली झपट्टा मारेगी तो चूहों की यह लड़ाई कितनी देर टिकेगी? फिलहाल तो भाजपा में जूतम पैजार चरम पर है.

Posted by गजेन्द्र सिंह at 11:49 am.

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