दिल्ली : अनशन से लेकर नाटक तक की कथा

शनिवार को शाम 5.30 बजे जब बाबा रामदेव रामलीला मैदान के मंच पर पहुंचे तो पहली बार पिछले तीन दिनों में उनके चेहरे से हवाइयां नहीं उड़ रही थीं. अपने योग शिविरों में हमेशा जिस बेलौस अंदाज में बाबा रामदेव अपनी बात कहते हैं, पिछले लगभग तीन दिनों में यह पहला ऐसा मौका था जब बाबा ने एक दो बार अपने प्रिय संबोधन "एं एं" का इस्तेमाल किया. इसका मतलब था बाबा के सिर माथे जो कुछ भी तनाव था उसका बोझ उतर चुका है.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं. साढ़े पांच से साढे छह बजे के बीच उन्होंने वहां उपस्थित अपने शिष्यों और मीडियाकर्मियों से जो बातचीत की उसमें उन्होंने दो तीन दफा यह संकेत दिया कि वे वार्ता करने जा रहे हैं. पीछे शिविर में फोन लगातार आ रहा है. लौटकर आयेंगे तो आगे की बात बताएंगे.

लौटकर आये. वे अब थोड़े और प्रसन्न थे. वहां उपस्थित अपने भक्तों को सूचित किया कि सरकार ने उनकी मांग मान ली है. काले धन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने पर वह सहमत हो गयी है. अभी वे अपने भक्तों को यह सूचना दे ही रहे थे कि पीछे से एक प्रेस कांफ्रेस की सूचना आयी जो कपिल सिब्बल की थी. जिस वक्त बाबा रामदेव सत्याग्रह के समाप्त करने की भूमिका बना रहे थे ठीक उसी वक्त उनसे बातचीत कर रहे मनमोहन सिंह के दूत कपिल सिब्बल भी एक प्रेस कांफ्रेस पीआईबी में कर रहे थे.

पीआईबी में उन्होंने पत्रकारों को एक चिट्ठी दिखाई जो कि बालकिशन ने लिखी थी. इस चिट्ठी में लिखा गया था कि सरकार ने सारी मांगे मान ली हैं इसलिए वे केवल 4 से 6 जून के बीच तप करेंगे. और जो सत्याग्रह है वह तो वे 4 जून को दोपहर में ही खत्म कर देंगे. अगर यह समझौता शनिवार का होता तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं था. यह समझौता सत्याग्रह शुरू होने से एक दिन पहले ही हो गया था. यानी सत्याग्रह को समाप्त करने का लिखित आश्वासन बाबा रामदेव और उनके चिंटू बालकिशन ने शुक्रवार को ही दे दिया था.

यानी वे शनिवार की सुबह से सत्याग्रह नहीं कर रहे थे बल्कि एक प्रहसन कर रहे थे. इस प्रहसन में एक एक कदम करते हुए आगे बढ़ रहे थे और अपनी योजना के अनुसार शाम आठ बजे अपनी जीत बताकर सत्याग्रह को समाप्त करने की घोषणा करने जा रहे थे. लेकिन इसी बीच कपिल सिब्बल ने बाबा को बेपर्दा कर दिया.

कांग्रेस या कपिल सिब्बल ने यह अनजाने में तो बिल्कुल नहीं किया होगा. एक सोची समझी रणनीति के तहत कपिल सिब्बल ने बाबा रामदेव के प्रहसन की पोल खोल दी. चोर की चोरी पकड़े जाने पर वह दो तरह से प्रतिक्रिया देता है. या तो वह एकदम चुप हो जाता है और बोलने के लिए मौके का इंतजार करता है. या फिर वह इतना अधिक बोलता है कि उस पर लगाये गये आरोपों के इर्द गिर्द वह एक बवंडर रच देता है.

बाबा रामदेव ने दूसरी वाली तकनीकि का इस्तेमाल किया. वे करीब दो घंटा बोलते रहे. क्या क्या बोले खुद उनको भी होश नहीं रहा होगा. सवालों का पिटारा लेकर दिल्ली आये बाबा रामदेव अपनी सफाई देते नहीं थक रहे थे. कपिल सिब्बल और कांग्रेस ने इतने कायदे से उन्हें ठगा था कि वे ठगे भी नहीं रह पाये. दो घण्टे पहले विजेता होने की घोषणा करने के लिए आतुर अब बाबा रामदेव धमकी देने, सफाई देने, ईमानदार होने, सत्याग्रह को जारी रखने, सरकार का आश्वासन मिलने, धोखा देने जैसी न जाने कितनी बातें की.

लेकिन किसी को कुछ सुनाई नहीं दिया. सुनाई दिया तो सिर्फ इतना कि बाबा रामदेव ने सत्याग्रह के साथ धोखा किया और करीब चौबीस घण्टे वे लोगों से झूठ बोलते रहे. प्रहसन के दृश्य बनाते रहे लेकिन जब कांग्रेस को लगा कि अब मंच का पर्दा उठाने का वक्त आ गया तो उसने वह पर्दा उठा दिया जिसके पीछे बैठकर बाबा रामदेव नयी भूमिका की वेषभूषा पहन रहे थे.

अन्ना के अनशन और रामदेव के प्रहसन में कोई तुलना नहीं की जा सकती. अन्ना का अनशन स्वत:स्फूर्त था और उसे मीडिया तथा नागरिक समाज आगे बढ़ा रहा था. इसके उलट बाबा रामदेव के इस प्रहसन में पटकथा लेखक, निर्देशक और नायक तीनों खुद ही बाबा रामदेव थे. आम समाज से इसमें कोई खास भागीदारी नहीं थी बल्कि बाबा रामदेव के योग मंडली और दवा कंपनी से जुड़े कर्मचारी रामलीला ग्राउण्ट पर इकट्ठा हुए थे.

मीडिया वहां भी थी और यहां भी. लेकिन जो मीडिया वहां अन्ना हजारे के सिर पर पगड़ी बांध रही थी उसी मीडिया ने रामलीला मैदान पर रामदेव की धोती खींच ली. जो कुछ अन्ना के अनशन में अपने आप हुआ उसे रामदेव ने अपने प्रहसन में करने की कोशिश की. लेकिन वे अपने इस प्रहसन को चौबीस घण्टे भी जारी नहीं रख पाये, और सच्चाई सामने आ गयी.

अन्ना के आंदोलन को रामदेव के जरिए कमजोर करनेवाली कांग्रेस ने रामदेव के दोगलेपन को जगजाहिर कर दिया. निश्चित रूप से बाबा रामदेव को कल्पना भी नहीं रही होगी कि कोई इतना बड़ा विश्वासघात उनके साथ कर सकता है. लेकिन खुद बाबा रामदेव ने क्या किया? उन्होंने भी तो आम जनमानस के साथ विश्वासघात ही किया. दिल्ली आये. तैयारियां की. गांधी की समाधि पर गये. भगत सिंह की प्रतिमा पर माला चढ़ाई.

यह सब करते हुए वे पर्दे के पीछे सरकारी प्रतिनिधियों से बातचीत भी करते रहे. भारतीय सत्याग्रह के इतिहास में ऐसा शायद पहले कभी न हुआ हो कि सत्याग्रह शुरू होने से पहले ही उसको खत्म करने पर खुद सत्याग्रही बातचीत शुरू कर दे. लेकिन रामदेव ने किया. उन्होने ऐसा संभवत: इसलिए किया क्योंकि वे अन्ना हजारे के अनशन से आहत थे. अति आत्मविश्वासी रामदेव को अपने धन बल और जनबल पर जरूरत से ज्यादा अहंकार है. दिल्ली में भ्रष्टाचार मिटाने के अभियान में शामिल होने आये रामदेव ने दो तीन महीनों के अंदर से भ्रष्टाचार से मुक्ति का अभियान अपने नाम करने की योजना बना ली.

इसके पीछे उनकी तार्किक सोच कम, उनका अहंकार ज्यादा था. देशभर में फैले उनके योग शिक्षक, योग अभ्यासी, दवा कारोबारी और शिक्षा से जुड़े लोगों का ऐसा नेटवर्क बन गया है जिनकी संख्या लाखों में है. वे सब बाबा रामदेव की एक आवाज पर कहीं भी पहुंच सकते हैं. अन्ना के अनशन में दरकिनार किये गये बाबा रामदेव ने भी घोषणा कर दी कि वे काले धन को भारत वापस लाने के लिए सत्याग्रह करेंगे.

यह घोषणा बाबा रामदेव के लिए गीदड़ के शहर में घुसने का ऐलान था. गीदड़ शहर में आता है तो उसके साथ क्या होता है इसकी कहावत आप जानते ही होंगे. बाबा रामदेव के साथ सरकार ने वही व्यवहार किया जो गीदड़ के साथ शहर वाले करते हैं. रामदेव को अन्ना हजारे के खिलाफ इस्तेमाल किया गया और पांच अप्रैल को जंतर मंतर पर जो माहौल बना था उसको ध्वस्त करने के लिए रामदेव के सत्याग्रह को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया. यह गीदड़ को फंसाने की पहली चाल थी.

इसके बाद रामदेव को इतना अधिक विश्वास में ले लिया गया कि लोकपाल के लिए गठित संयुक्त समिति में प्रधानमंत्री को लेकर जब विवाद पैदा किया गया तो रामदेव ने प्रधानमंत्री को न शामिल करने की वकालत की. केन्द्र की कांग्रेसी सरकार के वे ऐसे अंधभक्त बने कि शनिवार शाम साढ़े पांच बजे अपने शिष्यों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि मांगे पूरी होने के बाद वे माननीय प्रधानमंत्री जी का सार्वजनिक अभिवादन करेंगे. उनका गुणगान करेंगे, इत्यादि. रामदेव के इस रूख से अन्ना हजारे और उनकी मंडली का उत्साह बुरी तरह टूट गया.

अन्ना ने पहले तय किया कि वे सत्याग्रह में पांच जून को शामिल होंगे लेकिन बाद में कहा कि दिल्ली पहुंचकर निर्णय करेंगे. अन्ना की यह दूरी दूरदर्शी साबित हुई और रामदेव की कलई खुलते ही उनका सत्याग्रह अब चरमराकर बैठ जाएगा. अब बाबा रामदेव कुछ भी बोलें, सरकार उनकी कोई भी मांग मान लें, रामदेव का सत्याग्रह के साथ किया गया धोखा उनकी हर उपलब्धि को बौना करने के लिए पर्याप्त है.

अन्ना के अनशन से उठी लहर को अपने उत्थान के लिए इस्तेमाल करने के चक्कर में बाबा रामदेव ने अपना सत्यानाश कर लिया है. रामदेव ने अपने बड़बोलेपन से अपना जितना हौव्वा खड़ा किया था बालकिशन की एक चिट्ठी ने उस हौव्वे को हवा में उड़ा दिया है. रामदेव ने अन्ना के अनशन के नकल की तर्ज पर वह सब कुछ करने की कोशिश की जो अन्ना के अनशन में अपने आप हुआ था. लेकिन जैसा कि अपने देश में कहावत है.

नकल हमेशा होती है लेकिन बराबरी कभी नहीं. रामदेव के साथ भी वही हुआ. अनशन की नकल में जिस प्रहसन की पटकथा प्ले कर रहे थे, उसके पर्दे के पीछे की सच्चाई उन्हीं लोगों ने जगजाहिर कर दी जो इस प्रहसन के अहम किरदार थे. अन्ना के आयोजित हो गये अनशन को प्रायोजित सत्याग्रह से पाटने के लिए बाबा रामदेव ने जिस प्रहसन की पटकथा लिखी थी और नायक बनकर निर्देशन कर रहे थे, उसी पटकथा ने उन्हें जोकर बना दिया हैं.

Posted by गजेन्द्र सिंह at 5:42 am.

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