भ्रष्टाचार से पुराना नाता है कांग्रेस का
राजनीति 3:48 pm
इतिहास के पन्नों पर निगाह डाले तो 12 जून के दिन भारत के राजनीतिक इतिहास ने एक नई करवट ली थी, एक ऐसा मोड़ जिसका ज़िक्र भरत में बार-बार होता है.इसी दिन अदालत ने भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी पाया था.
इंदिरा गाँधी को आपातकाल के लिए कड़ी निंदा का सामना करना पड़ा.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने छत्तीस साल पहले यानी 1975 में 12 जून के ही दिन, भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाटाचार का दोषी पाया था.
अदालत ने विपक्ष के नेता राजनारायण की ओर से दाख़िल किए गए केस की सुनवाई करते हुए छह साल के लिए इंदिरा गांधी के किसी भी राजनीतिक पद ग्रहण करने पर पाबंदी लगा दी थी.
ये केस 1971 के संसदीय चुनाव के संदर्भ में दाख़िल किया गया था और अदालत ने पाया कि प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव में अनुमति से ज़्यादा ख़र्च किया और राजनीतिक कामों में सरकारी अमले और संसाधनों का दुरूपयोग किया। हालांकि न्यायधीश जगमोहन सिन्हा ने उन पर रिश्वत देने के आरोप को ख़ारिज कर दिया.
प्रधानमंत्री ने अदालत के इस आदेश के विरोध में उच्चतम न्यायालय जाने की बात कही थी. उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दल इस तरह के काम करते हैं.
जब विपक्ष ने उनके इस रवैये के ख़िलाफ़ देशव्यापी आंदोलन की शुरूआत करने का एलान किया तो उन्होंने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. बीस सासंदो समेत हज़ारों लोगों के गिरफ़्तार कर लिया गया और मीडिया पर सेंसरशिप लागू कर दिया गया.
संसद ने अगस्त 1975 में एक क़ानून पारित कर उनपर लगाए गए सभी दोषों को ग़लत ठहराया. और वो 1977 तक प्रधानमंत्री के पद पर बनी रहीं जिसके बाद हुए आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की बुरी तरह से पराजय हुई और भारत में केंद्र में पहली बार विपक्ष यानी ग़ैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ.
हालांकि इंदिरा गांधी 1980 में हुए चुनाव में फिर से सत्ता में वापिस आ गईं और 1984 तक इस पद पर बनी रहीं जब उनकी हत्या उनके ही अंगरक्षकों ने कर दी.

